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भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया की दस बड़ी विडम्बनाएं !

Posted On: 7 Apr, 2014 Contest में

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Contest/ भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया की विडम्बनाएं

भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया की दस बड़ी विडम्बनाएं !
-राजेश कश्यप

Lok Sabha Chunav- 2014

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का चुनावी महापर्व एक बार फिर शुरू हो चुका है अर्थात सोलहवीं लोकसभा के लिए गत 5 मार्च, 2014 को चुनावों का शंखनाद हो चुका है। लोकसभा-2014 के लिए देशभर में 7 अपै्रल, 2014 से लेकर 12 मई तक 9 चरणों में चुनाव होंगे। 16 मई को चुनावों के परिणाम घोषित किए जाएंगे। इस तरह से लोकतंत्र का यह चुनावी महापर्व कुल 72 दिन तक चलने वाला है।
कहना न होगा कि यह चुनावी प्रक्रिया हमारे लोकतांत्रिक ढ़ांचे का मूल आधार है। निष्पक्ष, निर्भिक और निर्विवादित चुनावी प्रक्रिया को अंजाम देना कोई सहज कार्य नहीं होता है। इसके लिए भारतीय निर्वाचन आयोग परिवार साधुवाद का पात्र है। इसके साथ ही यह कहने में गुरेज नहीं करना चाहिए कि भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया के साथ कुछ विडम्बनाएं भी जुड़ी हुई हैं, जोकि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप कदापि नहीं कही जा सकती। प्रमुख विडम्बनाएं इस प्रकार हैं:

1.    अति मंहगे चुनाव:

देश में अब चुनाव अति महंगे होते चले जा रहे हैं। देश में वर्ष 1951-52 में हुए प्रथम लोकसभा चुनाव में मात्र 60 पैसे प्रति मतदाता खर्च आया था, जोकि वर्ष 2009 में बढ़कर यह 12 रूपये प्रति मतदाता तक बढ़ चुका था। चौंकाने वाली बात यह है कि मात्र 5 साल के अन्तराल पर ही खर्च बीस गुना बढ़ चुका है। वर्ष 1951-52 में कुल 10 करोड़ 45 लाख रूपये खर्च हुआ था और वर्ष 2009 आते-आते यह राशि 846 करोड़ 67 लाख तक आ पहुंची। इससे पूर्व वर्ष 2004 में 1114 करोड़ रूपये खर्च हुए थे। अब ताजा लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग द्वारा 5000 करोड़ से अधिक खर्च करने और उम्मीदवारांे द्वारा 30,000 करोड़ खर्च करने का अनुमान जताया जा रहा है। इतने महंगे चुनावों का बोझ आम आदमी को ही न चाहते हुए झेलना पड़ता है। इसके साथ ही एक आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए इन चुनावों में भागीदारी करना बिल्कुल ही असंभव हो चला है। इससे निश्चित तौरपर लोकतंत्र धनबल और बाहुबल के हाथों की कठपुतली और पूरी चुनावी प्रक्रिया अमीरों अखाड़ा बन चुका है। कहना न होगा कि आज यह धनबल और बाहुबल ईमानदारी से तो हासिल होता ही नहीं है। यह तो गैर-कानूनी तरीके से ही संभव होता है। ऐसे में धनबल-बाहुबल-अपराधिकरण के चक्रव्युह में भारतीय लोकतंत्र छटपटाता और भारतीय चुनावी प्रक्रिया असहाय-सी नजर आती है।

2.    औसत मतदान प्रतिशत :

अरबों रूपया खर्च होने के बावजूद राष्ट्रीय मतदान का औसत रहना बेहद विडम्बना का विषय है। अब तक का चुनावी इतिहास बताता है कि वर्ष 1951-52 से लेकर वर्ष 2009 के बीच हुए 15 लोकसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत 55 से 64 प्रतिशत के बीच ही रहा है। इससे अधिक मतदान अभी तक नहीं हुआ है। इसका मतलब 36 से 45 प्रतिशत मतदाओं ने लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा ही नहीं लिया। क्या यह लोकतंत्र और भारतीय चुनावी प्रक्रिया में बेहद बड़ी विडम्बना का विषय नहीं है? कहना न होगा इसके चलते एक अल्पमत उम्मीदवार भी चुनाव जीतने में कामयाब हो जाता है। उदाहरण के तौरपर यदि मतदान 65 प्रतिशत हुआ तो ऐसे में 35 फीसदी मतदाओं का तो किसी भी प्रत्याशी को समर्थन नहीं हुआ। यदि कोई उम्मीदवार 25 फीसदी वोट लेकर भी विजय हासिल करता है तो कम से कम उसे 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का वोट तो नहीं मिलता है। फिर यह 25 फीसदी की जीत, वास्तविक लोकतांत्रिक जीत कैसे कही जा सकती है और इसे बहुमत की संज्ञा कैसे दी जा सकती है?

3.    वोटों की खरीद-फरोख्त :

कहना न होगा कि हर चुनाव में वोटों की खरीद-फरोख्त बड़े पैमाने पर होती है। उम्मीदवार अपनी सारी जमा-पूंजी को वोटों में तब्दील करने से कतई गुरेज नहीं करता, जिसके फलस्वरूप चुनावी खर्च तय मापदण्डों के कहीं अधिक होता है। धुर्त प्रत्याशी वोट पाने के लिए लोगों को महंगे-महंगे उपहार, पैसा, शराब, शबाब, कबाब आदि सबकुछ उपलब्ध करवाता है। चुनाव आयोग ऐसे गैर-कानूनी व अनैतिक कार्यों पर लगाम लगाने की भरसक कोशिश करता है, लेकिन, उसे नाममात्र भी कामयाबी हाथ नहीं लगती है। इससे लोकतंत्र का खुलकर चीरहरण होता है और हर कोई बस देखता ही रहता है। क्या इससे बढ़कर कोई अन्य विडम्बना होगी?

4.    चुनावों का बहिष्कार :

अक्सर मीडिया से पता चलता है कि फलां गाँव के लोगों अथवा फलां जाति के लोगों ने चुनावों का बहिष्कार करने और वोट न डालने का निर्णय लिया है। क्या यह भी लोकतंत्र के लिए विडंबना का विषय नहीं है? हाल ही में नक्सलियों ने गाँवों में सभा करके लोगों को चुनावी प्रक्रिया में भाग न लेने की चेतावनी भरी सलाह दी है। क्या चुनावी प्रक्रिया के लिए इससे बढ़कर और अन्य कोई विडम्बना हो सकती है? क्या चुनावों का बहिष्कार करना या फिर इसका हिस्सा किसी भी कारण से न बनना संविधान का अपमान नहीं है? यदि हाँ तो संविधान का अपमान इस तरह सरेआम क्यो?

5.    चुनावों का मखौल :

काफी उम्मीदवार चुनावों का सरेआम मखौल उड़ाते देखे जा सकते हैं। उन्हें चुनाव जीतने या हारने से कोई मतलब नहीं होता है। उन्हें या तो चुनाव लड़ने व अनोखा रिकार्ड़ बनाने की सनक होती है या फिर प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार से सौदेबाजी करके पैसा हासिल करने का मकसद रहता है। इन्हीं सबके चलते निर्दलीय उम्मीदवारों की भारी संख्या चुनावी मैदान में होती है और उन्हें अंततः जमानत जब्त करवानी पड़ती है। इससे उनका पैसा भी बर्बाद होता है और चुनाव आयोग को भी ऐसे उम्मीदवारों पर अनावश्यक खर्चा व क्रिया-कलाप करने पड़ते हैं। निश्चित तौरपर सनकी उम्मीदवारों द्वारा इस तरह चुनावों का मखौल उड़ाना चुनावी प्रक्रिया में एक बड़ी विडम्बना कही जा सकती है।

6.    निष्फल नोटा :

इस बार चुनाव आयोग ने मतदाताओं को ‘नोटा’ का विकल्प दिया है। इसका मतलब यदि किसी मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसन्द नहीं है तो वह मशीन में सबसे नीचे दिए गए ‘नोटा’ (इनमें से कोई नहीं) का बटन दबा सकता है। लेकिन, इसकी निष्फलता बेहद विडम्बना का विषय कही जाएगी। क्योंकि, उदाहरण के तौरपर यदि किसी चुनावी सीट के 60 प्रतिशत उम्मीदवार भी नोटा का इस्तेमाल करेंगे तो उससे चुनावी उम्मीदवारों पर किसी तरह का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। डाले गए अन्य वोटों के आधार पर ही उम्मीदवार को बहुमत के आधार पर विजेता घोषित कर दिया जाएगा। इस तरह इतना महत्वपूर्ण विकल्प ‘नोटा’ महत्वहीन और निष्फल ही कहा जाएगा, जोकि बेहद बड़ी विडम्बना का विषय है।

7.    चुनावी हिंसा :

चुनावों में अक्सर भारी हिंसा देखने को मिलती है। इस हिंसा का शिकार आम आदमी ही होता है। इससे सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारा भी प्रभावित होता है। यह चुनावी हिंसा लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा कलंक और बहुत बड़ी विडम्बना का विषय होती है।

8.    कमजोर वर्गों पर अनावश्यक दबाव :

देहातों में कमजोर, दलित व पिछड़े लोगों को सामाजिक व आर्थिक दबाव डालकर वोटों को हासिल करने की घटनाएं भी आमतौरपर देखी जा सकती हैं, जोकि लोकतंत्र के लिए बेहद विडम्बना का विषय है। कई बार दबंग लोगों द्वारा कर्जमन्द और हालातों के आगे मजबूर लोगों को उनकी इच्छा के विपरीत वोट देने के लिए बाध्य किया जाता है। ऐसे पीड़ित और शोषित लोग चाहकर भी अपनी आवाज नहीं उठा पाते हैं, जोकि एक आदर्श लोकतंत्र के लिए बेहद विडम्बना का विषय है।

9.    मतदाताओं की भावनाओं से खिलवाड़ :

प्रत्येक राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़े-बड़े चुनावी वायदे करते हैं और वोट हथिया ले जाते हैं। लेकिन, बाद में वे उन वायदों पर बिलकुल खरा नहीं उतरते हैं। इस तरह की चालबाजी निरन्तर चलती आ रही है। यह सीधे तौरपर मतदाताओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ और बहुत बड़ी विडम्बना का विषय है।

10.    राजनीतिक का अपराधिकरण :

देश की राजनीति का अपराधिकरण चुनावी प्रक्रिया के लिए सबसे बड़ी विडम्बना का विषय है। पहले भी बड़ी संख्या में भ्रष्ट व आपराधिक प्रवृति के लोग जनप्रतिनिधि के मुखौटे पहनकर देश की गरिमापूर्ण संसद और विधानसभाओं में पहुंचने में कामयाब हो चुके हैं। नैशनल सोशल वॉच (एनईडब्ल्यू) और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्मस (एडीआर) की रिपोर्ट-2013 के अनुसार देश की पन्द्रहवीं लोकसभा में 543 में से 152 सांसदों (लगभग 31 प्रतिशत) के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे, जिनमें से 17 प्रतिशत महिला सांसद भी शामिल थीं। रिपोर्ट के मुताबिक 1448 विधायक, सांसद एवं विधान परिषद सदस्यों के खिलाफ अभी भी मामले लंबित हैं। यह राजनीति का अपराधिकरण देश के लोकतंत्र के लिए किसी नासूर से कम नहीं है।

निःसन्देह, भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया के लिए ये दस बड़ी विडम्बनाएं बेहद चिंता एवं चुनौती का विषय हैं। इनके निराकरण के लिए देश के जन-जन को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditya upadhyay के द्वारा
April 8, 2014

सर , आपके इस समूचे लेख पर मैं पूर्णतः सहमत हूँ , जो भी हमारे देश की चुनावी विडंबनाएँ आपने बतायी हैं , वो बिलकुल सटीक हैं , एवं सार्थक लेख , धन्यवाद ऐसे ही हमे मार्गदर्शित करते रहिये ..धन्यवाद सर …

    rkk100 के द्वारा
    April 8, 2014

    आदित्य उपाध्याय जी, आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से आभार। कलम का उत्साहवर्द्धन करने के लिए कोटि-कोटि नमन एवं आपके बड़प्पन को साधुवाद। कृपया अपना स्नेह एवं मार्गदर्शन भविष्य में भी यूं ही बनाये रखियेगा। पुनः आपका आभार और धन्यवाद आदित्य जी।

ikshit के द्वारा
April 8, 2014

बेहद सटीक वार किये हैं आप ने हालात पर… तो क्या संविधान में ek परिवर्तन कि aavasyakta है? – साभार इच्छित

    rkk100 के द्वारा
    April 8, 2014

    Ikshit जी, अत्यन्त सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से आभार एवं धन्यवाद। मैं भी आपके विचार से सहमत हूँ।


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