बुरी लगे या लगे भली

निष्पक्ष, निडर, निर्भिक एवं निर्लेप रचनात्मक अभिव्यक्ति

98 Posts

198 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 265 postid : 316

ममता बनर्जी का कदम स्वागत योग्य

Posted On: 19 Sep, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

ममता बनर्जी का कदम स्वागत योग्य

-राजेश कश्यप

तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पंश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आम जनभावनाओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए साहसिक व स्वागत योग्य निर्णय लिया है। यूपीए-दो से नाता तोड़ने और सभी छह मंत्रियों के इस्तीफा देने के निर्णय से ममता दीदी अपने माँ, माटी और मानुष पर एकदम खरा उतरी हैं। यही समय का तकाजा था। ममता के इस फेसले से निश्चित तौरपर आम जनमानस को राहत मिलेगी। कांग्रेस सरकार ने भ्रष्टाचार की सारी हदें तो पार कर ही डालीं हैं, साथ ही संसदीय मर्यादाओं को भी तार-तार करके रख दिया है। महंगाई और भ्रष्टाचार ने आम आदमी का जीना बेहद मुश्किल कर दिया है। लाखों करोड़ के घोटालों की लंबी कतार लगाकर भी यूपीए सरकार को जरा भी शर्म नहीं आ रही है। सहयोगी पार्टियों को हाशिये पर रखने वाली यूपीए सरकार अति आत्मविश्वास के साथ-साथ भारी अहंकार का शिकार हो गई है। आम आदमी के प्रति संजीदगी दिखाने और अपने दायित्व के प्रति गंभीरता दिखाने की बजाय यह कहना कि जाना ही है तो लड़ते हुए जाएंगे, बहुत बड़ा गैरजिम्मेदाराना रवैया है।
आम जनता मूर्ख नहीं है। लेकिन, यूपीए सरकार उसे मूर्ख ही नहीं, बल्कि महामूर्ख मानती है। इसी के चलते केन्द्रीय गृहमंत्री सरेआम बड़ी बेशर्मी के साथ हंसते हुए कहते हैं कि जिस तरह जनता बोफोर्स घोटाले को भूल गई, उसी प्रकार कुछ दिन बाद कोयला घोटाले को भी भूल जाएगी। निश्चित तौरपर यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा मजाक है। देश की जनता भूख, भ्रष्टाचार, बेकारी और बेरोजगारी से त्रस्त है और सरकार घोटालों में व्यस्त है। किसान कर्ज के चलते आत्महत्या करने को मजबूर हैं। कमाल की बात तो यह है कि देश की आर्थिक विकास दर भ्रष्टाचार और बड़े-बड़े घोटालों की भेंट चढ़ गई। इसे सुधारने के लिए देश की अस्मिता को एफडीआई के जरिए गिरवी रख दिया गया है। किरयाना सैक्टर से जुड़े करोड़ों भारतीयों का गला काटकर विदेशियों को सरेआम लूट मचाने का न्यौता देने देश के लिए सबसे बड़ा आत्मघाती कदम है। एफडीआई एक तरह से परोक्ष रूप से गुलामी को आमंत्रण देने के समान है। सन् 1600 में भी ब्रिटिश कंपनी छोटा सा कारोबार करने के लिए आई थी और उसके बाद जिस तरह से देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा गया, उसका इतिहास गवाह है। विडम्बना का विषय है कि देश की आधारभूत संरचना मजबूत करने की बजाय देश के हितों को गिरवी रखा जा रहा है।
यूपीए सरकार की निरंकुशता पर लगाम लगाने के लिए ममता बनर्जी ने आम आदमी का विश्वास जीत लिया है। ममता द्वारा दो घण्टे की मैराथन बैठक के बाद अपने सीधे और सपाट निर्णय के साथ तीन शर्तें भी सराहनीय हैं। यदि यूपीए सरकार इन तीनों शर्तों को स्वीकार करती है तो यह लोकतंत्र की जीत होगी, जिसका सीधा श्रेय ममता बनर्जी को जाएगा। ममता बनर्जी ने जिस तरह सरकार में रहकर अन्य दलों की भांति सौदेबाजी से परहेज किया और जिस तरह मंत्रालयों का लालच त्यागा है, यह अत्यन्त सराहनीय है। ममता बनर्जी से यूपीए के अन्य सहयोगी दलों को भी सीख लेनी चाहिए। यह माना कि ममता के 19 सांसदों के सरकार से बाहर होने के बाद यूपीए सरकार पर कोई बड़ा संकट आने वाला नहीं है। क्योंकि बिना पैंदी के लोटे की तरह बार-बार ढुलकने और गिरगिट की तरह देखते ही देखते रंग बदलने वाले समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, अपने नीजि हित साधने व अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए यूपीए सरकार के हाथों गिरवी रखकर आत्मघाती कदम उठाने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती और एम. करूणानिधि आदि यूपीए सरकार को समर्थन दे रहे हैं। अभी तक उनमें आम जनता का दर्द कहीं नजर नहीं आ रहा है। मुलायम सिंह और मायावती एक दूसरे को मात देने के चक्कर में आम जनता को मारने में लगे हैं। यदि ये भी ममता बनर्जी की भांति आम जनता के हित में अपने स्वार्थों को छोड़कर बड़े साहसिक कदम उठाने का निर्णय लें तो निश्चित तौरपर उनके कद में इजाफा होगा। यदि वे ममता बनर्जी के क्रांतिकारी आगाज के बावजूद यूपीए सरकार के साथ बने रहते हैं तो वे जनता की नजरों से गिर जाएंगे, जिसका भारी भुगतान उन्हें आगामी वर्ष 2014 के चुनावों में करना पड़ेगा।
इसके साथ ही यूपीए सरकार एवं उसके सहयोगी दलों को भी यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि उनके दिन अब लद चुके हैं। बड़े-बड़े घोटालों के बावजूद बेशर्मी का प्रदर्शन करने वाली यूपीए सरकार जनता की नजरों में एकदम गिर चुकी हैं। जिस तरह से संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया और इससे नुकसान हुए करोड़ों रूपये का नुकसान की जिम्मेदार भी सीधे तौरपर यूपीए सरकार ही उतरदायी रही है। जिस तरह से कोयले की खदानों की लूट हुई, टू-जी स्पैक्ट्रम में जमकर लूट हुई, राष्ट्र मण्डल खेल में सरेआम डाका डाला गया और कई अन्य बड़े घोटालों को अंजाम दिया गया, उससे आम जनता अत्यन्त आक्रोशित हो चुकी है। जिस तरह से कांग्रेस सरकार ने कैग व चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को अपना निशाना बनाया है, उसके परिणाम भी बेहद घातक सिद्ध होंगे। यूपीए सरकार को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जनता की चोट जब भी पड़ती है, वह लंबे समय तक उसकी दर्द से उबर नहीं पाता है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)



Tags:     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran