बुरी लगे या लगे भली

निष्पक्ष, निडर, निर्भिक एवं निर्लेप रचनात्मक अभिव्यक्ति

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हरियाणा के चौथे ‘लाल’ : मनोहर लाल!

Posted On: 31 Oct, 2014  
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जनसंख्या विस्फोट : चिन्ता एवं चुनौतियाँ

Posted On: 10 Jul, 2014  
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Others Special Days social issues में

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प्रत्याशित परिणाम, अप्रत्याशित प्रदर्शन

Posted On: 16 May, 2014  
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भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया की दस बड़ी विडम्बनाएं !

Posted On: 7 Apr, 2014  
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वैश्विक संस्कृति में रची बसी होली!

Posted On: 28 Mar, 2014  
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लिया देवर रंग घोल कै…

Posted On: 28 Mar, 2014  
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‘विश्वास-मत’ की कसौटी पर ‘आप’

Posted On: 1 Jan, 2014  
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हिन्दी के लिए धीमा जहर: ‘हिंग्लिश’!

Posted On: 28 Sep, 2013  
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हिन्दी पखवाड़ा: दिखावे में भी दम है!

Posted On: 25 Sep, 2013  
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हिंदी के लिए ब्रम्हास्त्र…!

Posted On: 6 Sep, 2013  
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आम आदमी की नब्ज टटोलता बजट !

Posted On: 1 Mar, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आम बजट : ढ़ाक के तीन पात !

Posted On: 28 Feb, 2013  
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आखिर श्रमिक कब तक सहेगा शोषण ?

Posted On: 22 Feb, 2013  
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खतरे में पड़ती नारी अस्मिता !!

Posted On: 24 Dec, 2012  
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दलितों और पिछड़ों के मसीहा थे डॉ भीमराव अम्बेडकर

Posted On: 6 Dec, 2012  
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आखिर कब रूकेगा बलात्कारों का यह अनवरत शर्मनाक सिलसिला?

Posted On: 19 Oct, 2012  
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ममता बनर्जी का कदम स्वागत योग्य

Posted On: 19 Sep, 2012  
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हिन्दी के ह्रास का सबब बनी ‘हिंग्लिश’

Posted On: 14 Sep, 2012  
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स्वतंत्रता के सच्चे सबक!

Posted On: 15 Aug, 2012  
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खाप पंचायतों का असली नकली चेहरा !

Posted On: 19 Jul, 2012  
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एनजीओ पर नकेल क्यों और कैसे?

Posted On: 11 Jul, 2012  
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धूम्रपान एवं तम्बाकू सेवन: खुशहाल जीवन का अजेय दुश्मन

Posted On: 31 May, 2012  
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‘सृष्टि सृजक‘ महर्षि कश्यप का पौराणिक स्वरूप

Posted On: 21 May, 2012  
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जननी तेरी जय है !

Posted On: 12 May, 2012  
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मजदूर: मंजिल अभी है कोसों दूर !

Posted On: 30 Apr, 2012  
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चुनावी हार और जीत के मूल सबक

Posted On: 6 Mar, 2012  
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वैश्विक संस्कृति में रची बसी होली

Posted On: 6 Mar, 2012  
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क्रांतिकारियों के सरताज: चन्द्रशेखर आजाद

Posted On: 24 Feb, 2012  
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सशस्त्र क्रांति के अग्रदूत वीर सावरकर

Posted On: 24 Feb, 2012  
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भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक शबरी

Posted On: 24 Feb, 2012  
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शिवमयी है हरियाणा का जन-जन और कण-कण

Posted On: 19 Feb, 2012  
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समाज के महादिग्दर्शक स्वामी दयानंद सरस्वती

Posted On: 15 Feb, 2012  
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ढ़ाई आखर प्रेम के….

Posted On: 11 Feb, 2012  
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हरियाणा में छाया काले हिरणों के अस्तित्व पर घोर संकट

Posted On: 8 Feb, 2012  
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पानीपत के युद्धों का पूरा सच

Posted On: 12 Jan, 2012  
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जंग-ए-आजादी के नायाब महायोद्धा थे सरदार उधम सिंह

Posted On: 21 Dec, 2011  
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कहीं कलयुग के कंस न बन जाएं कल के कर्णधार !

Posted On: 13 Nov, 2011  
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गरीबी के बदलते पैमाने और मायने

Posted On: 5 Oct, 2011  
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यदि मैं प्रधानमंत्री होता….

Posted On: 31 Aug, 2011  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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भ्रष्टाचारियों को सलाम!

Posted On: 29 Aug, 2011  
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दबंगों की दबंगई और दलित व पिछड़ा समाज

Posted On: 5 May, 2010  
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जीव-हत्या मत कर…!

Posted On: 16 Mar, 2010  
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Others sports mail टेक्नोलोजी टी टी न्यूज़ बर्थ में

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आजादी का अर्थ

Posted On: 11 Mar, 2010  
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Others sports mail टेक्नोलोजी टी टी न्यूज़ बर्थ में

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सादर नमस्कार

Posted On: 11 Mar, 2010  
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Hello world!

Posted On: 28 Jan, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

कृप्या इन बिन्दुओं पर ध्यान दें और पूरी जांच करनें के बाद ही अपना वोट डालें। • गुजरात में अमित जेठवा जैसे RTI कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी जाती है, जिसमें भाजपा के नेताओं के नाम स्पष्ट रुप से शामिल हैं। • गुजरात में 10 साल तक लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की गई। जब राज्यपाल ने लोकायुक्त को नियुक्ति किया तो राज्य सरकार ने इसको किसी भी तरह से रोकने के लिए मुक्द्दमें में 45 करोड़ खर्च किए। • Supreme Court ने गुजरात सरकार की मंत्री आनंदी बेन पटेल को एक जमीन आवंटन के मामले में दोषी पाया पर वो आज भी गुजरात सरकार में मंत्री बनी हुई हैं। • 400 करोंड़ के मछली पालन घोटाले में कोर्ट द्वारा दोषी पाए गए पुरुषोत्तम सोलंकी गुजरात मंत्रीमंडल को आज भी सुशोभित कर रहे हैं। • भ्रष्टाचार के मामले में जेल यात्रा कर चुके यदुरप्पा को भाजपा पार्टी में फिर शामिल किया। चुनाव के शोर में सच कई बार सुनाई नहीं देता खासकर जब शोर करने वाला झूठ बोलने में माहिर हो। राम कृष्ण खुराना

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

अंग्रेजीदां लोगों ने हिन्दी को इस मुकाम पर पहुंचाने के लिये ऐसी तकनीक ईजाद की, यह उनका बड़प्पन भी है और उनकीं मजबूरी भी। ‘बड़प्पन’, इसलिए कि हिन्दी को आत्मिक रूप से अपनाने वाले कभी कृतघ्नता नहीं दिखाते। यदि उन्होंने हिन्दी के लिये कोई अच्छा काम किया है तो हर हिन्दी प्रेमी दिल से उसका स्वागत करेगा और संबंधित लोगों को साधुवाद देगा। ‘मजबूरी’ इसलिए, क्योकि हिन्दी का स्वरूप असीम है। हिन्दी को जानने वाले लोग दुनिया के किसी भी देश और कोने में मिल जाएंगे। आधुनिक दुनिया पर बाजारवाद हावी हो गया है। इस बाजारवादी युग में किसी भी कम्पनी या कार्यक्रम को टिकने के लिए हिन्दी की तरफ बेबस होकर मुँह ताकना ही पड़ता है। ऐसे में हिन्दी को आधुनिकतम उपहार ‘युनिकोड-कन्वर्टर’ का उपहार देना, जहां उसकी मजबूरी है, वहीं उसकी खुशनसीबी है। बिलकुल !

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गाँधी जी क्रोध से बचने की हमेशा शिक्षा देते थे। वे कहते थे कि ‘‘क्रोध एक प्रचण्ड अग्नि है। जो मनुष्य इस अग्नि को वश में कर सकता है, वह उसको बुझा देगा। जो मनुष्य इस अग्नि को वश में नहीं कर सकता, वह स्वयं अपने को जला लेगा।’’ गाँधी जी ने क्रोध पर काबू पाने का मंत्र भी दिया। उन्होंने बताया कि ‘‘क्रोध को जीतने में मौन जितना सहायक होता है, उतनी और कोई भी वस्तु नहीं।’’ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी शिक्षा पर बेहद जोर देते थे। वे कहते थे कि ‘‘शिक्षा का उद्देश्य महज साक्षर होना नहीं, बलिक शिक्षा का उद्देश्य, आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति का जरिया होना चाहिये। यह तभी संभव है, जब शिक्षा प्रयोजनवादी/बुनियादी विचारधारा पर आधारित होगी।’’ गांधी जी शिक्षा की गुणवता को बढ़ाने के लिए भी बराबर प्रेरित किया करते थे। उनका मानना था कि ‘‘अध्यापक विद्यार्थी को योग्य बनाने के दायित्व को पूर्णतः निभाए। मानवीय चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा में आवश्यक पाठ्यक्रम का विकास होना चाहिये। विद्यार्थी के मस्तिष्क से किताबों का बोझ कम होना चाहिये। विद्यार्थी और शिक्षक, दोनों को राजनीति से दूर रहना चाहिये। सुन्दर एवं स्वस्थ जीवन को बनाने के लिए शिक्षा में योग-शिक्षा का होना अति आवश्यक है।’’ आज के समय में जब भारत के लोग गाँधी और उनकी शिक्षाओं को भुला देने पर अमादा है ऐसे में विश्वभर में महात्मा गाँधी की बढती लोकप्रियता और उनकी दी गयी शिक्षा का बढ़ना एक विरोधाभास सा लगता है ! मैंहमेशा ही ये मानकर चला हूँ की गाँधी को किसी भी परिवेश में भुलाया नहीं जा सकता ! बहुत सुन्दर आलेख श्री कश्यप जी !

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श्री राजेश कश्यप जी , सादर नमस्कार ! मुझे पता था आप मंच पर आये हैं तो अवश्य ही कुछ ज्ञानवर्धक लेख के साथ प्रकट हुए होंगे ! सच मानिए तो मैंने एक ही सांस में आपका लेखन पढ़ लिया लेकिन फिर कुछ कमी महसूस हुई अपने ज्ञान में तो दोबारा धीरे धीरे पढ़ा ! डॉ . भीम राव आंबेडकर ने जिन हालातों को भुगता उनकी सिर्फ कल्पना करी जा सकती है ! लेकिन उन्होंने जिन लोगों के लिए सच में कार्य करने का बीड़ा उठाया वो लोग आज भी वंचित हैं समाज के विकास से ! ये बात है की लोगों को विकास करने का अवसर मिला और हमारे राज्य में तो दलित मुख्यमंत्री तक भी बना ! लेकिन क्या इस सबसे समाज के निचले स्टार के लोग अपने आप को समाज की मुख्या धरा में ला सके ? डॉ, भीमराव आंबेडकर का सिधांत , उनकी सोच समाज के आखिरी आदमी तक पहुँचने की थी लेकिन उनके विचारों को "कैप्चर " कर लिया गया और सिर्फ कुछ लोगों तक ही इसका फायदा पहुँचता रहा जो आज भी पहुँच रहा है ! एक चीज मैं आपसे पूछना चाहूँगा - रमा बाई आंबेडकर , यानी डॉ, आंबेडकर की प्रथम पत्नी के विषय में आपने स्पष्ट नहीं किया ! डॉ. आंबेडकर ने दूसरी शादी क्यूँ करी और प्रकाश आंबेडकर किसके पुत्र हैं रमा बाई के या सविता आंबेडकर के ?

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

दिनेश आस्तिक जी, सर्वप्रथम क्षमा चाहता हूँ। अपरिहार्य कारणों से मैं प्रत्युतर नहीं कर सका। आपने अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करवाया और तारीफ की, इसके लिए मैं आपका अत्यन्त आभारी और अहसानमन्द हूँ। जहां तक मेरे नाम समझ में न आने की बात है तो मेरा नाम ‘राजेश कश्यप’ है। दरअसल, जब मैंनें ब्लॉग बनाया था तो उस समय मैं इन ब्लॉगों से बिल्कुल अनजान था। पहली बार मुझे जो कुछ समझ आया वहीं कॉलमों में भरता चला गया। यूजर नेम के कॉलम में मैंने ईमेल का संक्षिप्त कूट शब्द ‘आरकेके100’ भर दिया। मुझे नहीं पता था कि बाद में यही कूट शब्द स्क्रीन पर दिखाई देने वाला है। मैं इसे बदलने की चाह रखता हूँ। लेकिन, फिलहाल यह सुविधा इस ब्लॉग-प्रबन्धन मंे मिली नहीं। यदि आपके पास कोई उपाय हो तो जरूर बताईगा। आपका प्रतिक्रिया के लिए पुनः आभार एवं धन्यवाद।

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सम्माननीय श्री ओम प्रकाश शुक्ला जी, सर्वप्रथम मैं आपसे हाथ जोड़कर क्षमा चाहता हूँ कि भूलवश मैं आपकी इस प्रतिक्रिया का जवाब समय पर नहीं दे पाया। हौंसला अफजाई के लिए धन्यवाद। आपकी शहीदे आज+म भगत सिंह जी के बारे में की गई सटीक टिप्पणियों ने दिल को छु लिया। सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए पुन: धन्यवाद। लेखनी आपकी आभारी रहेगी। जहां तक राहुल गाँधी जी के बारे में लिखी गई एक पोस्ट के बारे में है। तो शुक्ला जी, राहुल जी, हमारे समाज का ही एक हिस्सा हैं। वो भी अपने कैरियर के लिए भागदौड़ कर रहे हैं। हम भी करते हैं। भले ही वे राजनीतिक क्षेत्र में कर रहे हैं। हर किसी को अपना कैरियर व जिन्दगी बनाने की आजादी है। भले ही वे अपनी राजनीति चमकाने के लिए ये सब कुछ कर रहे हैं। लेकिन कर तो अच्छा ही रहे हैं, न! यदि किसी रोगी को उसका हालचाल दिल से न सही, झूठे ही सही यदि पूछ लिया जाये और औपचारिकता पूरी करते हुए उसे जल्दी ठीक होने का आश्वासन दिया जाए तो क्या उस मानसिक रोगी को आत्मिक सुकून नहीं होगा? मैं पार्टियों या संगठनों में यकीन करता। कोई भी व्यक्ति किसी भी संगठन से जुड़ा हो और अच्छा काम करता हो तो मेरा दिल करता है कि मैं उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा करूं। इसके विपरीत कोई भी व्यक्ति कितना ही रौबदार और Åंचे पद या पार्टी से संबंध रखता हो और गलत आचरण करता हो तो मैं किसी के रोके से भी उसकी आलोचना करने से नहीं रूक सकता। यदि मेरे दिल ने राहुल की तनिक सी तारीफ करने को कहा और मैनें कर दी, तो क्या बुरा किया शुक्ला जी। यदि हाँ तो मैं आपसे माफी चाहता हूँ और नहीं तो आपसे अपना प्यार एवं मार्गदर्शन बनाए रखने की आशा रखता हूँ। धन्यवाद एवं आभार।

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विनीता शुक्ला जी, आपने लेख पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया दी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने इन अत्याचारों की जिम्मेदार पुरूषवादी सोच को माना है। यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। लेकिन इसके साथ ही कई अन्य पहलू भी हैं। इन पहलूओं पर पर भी समाज को समग्र चिन्तन करना होगा। इसके साथ ही ऐसे घृणित अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए क्या-क्या कदम उठाये जाने चाहिए, इन मसलों पर भी व्यापक विचार-विमर्श आवश्यक है। कहने का अभिप्राय इस मुद्दे पर हर परिपेक्ष्य में देश व समाज को गहन विचार विमर्श की आवश्यकता है। इन्ही सब पहलूओं पर निकट भविष्य मंे मेरा एक लेख आप सबकी सेवा में हाजिर होगा। आप सबसे पूर्ण उम्मीद है कि अपनी राय, सुझाव एवं मार्गदर्शन मिलता रहेगा। अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पुन: आभार।

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मैं भारत हूँ, अभागा भारत| आप सब आज मुझ से भली भांति परिचित हैं| मेरा वर्तमान स्वरूप कब और कैसे बन गया मुझे खुद ही पता नहीं चला| मेरी धरातल पर अपनी ही कमजोरियों के कारण सदियों से आक्रमणकारियों द्वारा रौंदे गए छोटे बढे विभिन्न राज्यों में रहते बाशिंदे मुठी भर अंग्रेजों की चालाकी और धूर्तता की नीति में फस कर रह गए| राजे रजवाडों ने उनकी प्रभुसत्ता के अंतर्गत मेरे बाशिंदों पर अपनी मनमानी से राज किया| राएज़ादों, राएबहादुरों, चौधरियों, और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े बाबुओं नें मुझ ब्रिटिश इंडिया पर अंग्रेजों के शासन को निरंतर बनाए रखने के लिए उनकी भरपूर सहायता की| अंग्रेजों के टुकड़ों पर पलते उन्हें मेरा और मेरे बाशिंदों का कभी ध्यान नहीं आया| गरीबी और अज्ञानता में पल रहे मेरे बाशिंदों के शरीर के साथ साथ उनकी आत्मा भी इतनी क्षीण हो गई कि आजादी के तिरेसठ वर्षों बाद भी अपने अच्छे बुरे का विचार किये बिना मुझ गणतंत्र भारत में गुलामी की परम्परा को बनाये रख अब वे काले-अंग्रेजों की छत्र छाया में जी रहे हैं| मिथ्या आजादी में राएज़ादों, राएबहादुरों, और चौधरियों के नए रूप में आज काले-अंग्रेजों से कुछ पा लेने के प्रलोभन में उनके कार्यकर्ताओं व पढ़े लिखे युवा वर्ग के सदस्यों ने जैसे मेरी और मेरे साधारण बाशिंदों की दयनीय स्थिति से मानों अपनी आँखे मूंद ली हैं| आखें मूंदें आज खिलोना समझ मुझे वे राहुल बाबा को सोंप देना चाह रहे हैं| मेरे मध्य प्रदेश प्रांत में स्थित छोटे से कोलार की दुर्दशा मेरे कुल धरातल पर सैंकडों हज़ारों छोटे बढे गाँव, कस्बों, और शहरों की सी है| आजादी में नए नवेले दूल्हे के समान सुन्दर तो कभी नहीं बन पाया लेकिन आधा अधूरा सांसे ले रहा कोलार मेरी और मेरे बाशिंदों की दयनीयता को अवश्य समझता है| लगता है कि कोलार को भोपाल से कुछ पा लेने की व्यक्तिगत उम्मीद ने उसे काले अंग्रेजों की हाजरी में ला खड़ा किया है| मैं अभागा भारत अपने गरीब, अज्ञान, और रुग्ण बाशिंदों को गोद में लिए कब तक सिसकियाँ लेता रहूँगा?

के द्वारा:

के द्वारा: Nikhil Nikhil

मैं शिबू आर्य, मथुरा, ओम प्रकाश शुक्ला जी का अत्यंत आभार व्यक्त करता हूँ की आपने अपना कीमती समय निकाला और मेरी अभिव्क्ति पर अपनी अनमोल प्रतिक्रियाएं दीं. आपने जिन पदवियों से मुझे नवाजा और जिन शब्दों का चयन किया उनसे मुझे बेहद तकलीफ हुए, लेकिन इस बात की ख़ुशी भी हुयी कि आप जैसे बेबाक व मूर्धन्य विद्वान हैं जो आम आदमी के दर्द को अपने सीने में दबाये रखतें हैं. आपके जज्बातों को में सलाम करता हूँ. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मैनें कभी निजी स्वार्थपूर्ति के लिए अपनी कलम नहीं चलायी और जो भी लिखा आम आदमी के तौर पर लिखा. शायद यह हमारी संस्कृति का ही असर है कि सुख में शामिल होने वालों की तुलना में दुःख में शामिल होने वालों को अधिक हितेषी कि नजर से देखा जाता है. राहुल गाँधी चालीषा लिखने, कांग्रेस का वो नेता होने जिसकी पार्टी में कोई पूछ नहीं है, कांग्रेस का पिठू बनाने जैसी न कोई बात है और मैं ऐसा करना चाहता हूँ। यदि मिर्चपूर काण्ड में राहुल गाँधी के प्रति सम्मान में यदि आवश्कता से अधिक उपमाएं लिख दी गई हैं, वो जानबूझकर नहीं, बल्कि वो हृदय की स्वत: प्रस्फूटित अभिव्यक्ति है। जिस समाज के लोगों के दु:ख दर्द बांटने वो पहुंचे, उस समाज के अन्य झण्डेदारों और कथित मसीहाओं की लंबी फौज खड़ी है, जिनसे उम्मीद थी कि वे सबसे पहले पीड़ित परिवारों की सुध लेंगे। लेकिन यदि दु:ख के समय में कोई अपनी सहानुभूति लेकर दुख-दर्द बंटाने पहुंचे (चाहे ढोंग ही क्यों न हो) तो भी वह व्यक्ति धन्यवाद का पात्र है। यदि दुश्मन भी शमशान में चिता को लकड़ी देने पहुंचता है तो समाज में उसका कद स्वत: बढ़ जाता है। यह बिल्कुल सही है कि आज वोटतंत्र है, यदि वोटतंत्र नहीं होता तो मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि दलितों, पिछड़ों, असहायों, गरीबों की कोई सुनवाई करने वाला अथवा उन्हें संभालने वाला, अथवा उनका दु:ख-दर्द बांटने वाला कोई भी नहीं होता। गरीबों के पास एक वोट ही वो ताकत है जो बड़ों-बड़ों को झुकाने की ताकत रखता है। इसके लिए पूरा देश व समाज बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर जी अत्यन्त आभारी है, कि उन्होंने ऐसा संविधान बनाया, जिसमें गरीबों, दलितों एवं पिछड़ों के सम्मान को न केवल बरकरार रखा, अपितु उसमें निरंतर बढ़ौतरी भी की। आज दलितों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों के कथित मसीहा अपने समाज को नजरअन्दाज करके खूब ऐशोआराम लूट रहे हैं और राजनीति अपने समाज के नाम पर करते हैं। क्या ऐसे नेताओं के प्रति रोष जताना कोई गलत बात है? जिस समाज के धुरन्धर नेता पीड़ित परिवार की आकर जात भी न पूछें तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा? मैं तो इस विचारधारा का आदमी हूँ कि यदि अपना आदमी भी कोई बुरा काम करे तो उसकी निंदा अवश्य करूंगा और जो कोई दुश्मन भी अच्छा काम कर दे, तो मैं निष्पक्ष एवं निर्लेप होकर उसकी प्रशंसा अवश्य करूंगा, फिर चाहे मुझे कोई किसी भी तरह की उपमा भी क्यों न दे? बाकी यह लोकतंत्र है। सबको अपने विचार देने की पूर्ण आजादी है। आपके विचारों का भी मैं स्वागत करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में भी आपकी अनमोल प्रतिक्रियाएं बराबर मिलती रहेंगीं। इसी आशा एवं विश्वास के साथ प्रतिक्रियाओं के लिए आपका पुन: धन्यवाद।

के द्वारा: rkk100 rkk100

yah lekh kijagah Rahul chalisa adhik lagata hai.Lekhak mahoday ya to had darje ke chaplus hai ya agyani yah bhi ho sakta hai ki janbrjh ker Rahul ka media manege ka rahe ho.Rahul ki rajneet vishudh rup se dhokhdhadi ki rajneet hai.ek taraf to hariyana ke dalit atyachar per duod ker pahuchate hai aur wahi Maharashtra aur Bumbai me unaki sarkarhote huye purbio uttar oradesh ,bihar ke logo koanawashyak rup se peeta jata hai to muh chupa lete hai.unake muh se santwana ke do bol bhi nahi futate hai.Aj pure desh me naxsalvadio ki samsya pramukhata per hai,lekin hamare yuvraj aur bhavi pradhan mantri ke muh se issambandh me koi bol nahi futata hai.Rahul Gandhi ko garib sirf uttar pradesh ke dalito me hi dikhai dete hai.,unake khandan ke pach dasak ke shasan me desh kaha chala gaya.hamare sath ajad huye desh aj hame muh chidha rahe hai,aur hum है की heen bhawan se grasit ho gandhi khandan ke alawa kuch dekh hi nahi pate.Akhir is bat ka kya auchitya है की ek kal ka ladaka hi hame itane bade desh ka pradhan mantri ke rupme dikh raha है.,kya anubhaw है Rahul ka anterrashtriy mamlo me.,jis admi ko apne desh ke bhugol ka pata nahi है wah desh ke pradhan mantri hone ke liye utawala ho raha है.Kayde se Rahul Gandhi ko pahle anubhaw prapt karna chahiye,lekin lagata haiki Rahul ko viswas nahi है की hame log pradhan mantri ke rup me swikar karege.isi liye wo bahut jaldi me है.Jis tarah Rahul aur Sonia Gandhi ko uttar pradesh me sirf Amethiaur Raibareli की chinta rahati है wah bhi hasyaspad hi है.JO janadhar wala neta hota है tatha jiski rashtriy pahchan hoti है uske liye pura desh,her loksabha chetra mahtwapurd hota है.,wah apne ko chetra vishesh se hi badha nahi rakhata.Atalbihari Bajpeyi iske udaharad the jo apne karyakal me kai jagah se ladte aur jitate rahe.Aj bhi Adwani kabhi sirf Gandhinager ko hindustan man ker nahi chal rahe है.Rahul Gandhi ka pakhand abhi Baba Sahab Bhima Rao Ambedker ke janmdiwas per congress ke sthapana ke 125 jayanti per Ambedker nager me congress की smarika ka vimochan kiya aur us smarika me Ambedker ke yogdan ke bare me koi jikra tak nahi tha aur kisi rashtriya nrta ke yogdan ko uchit sthan mila ,Yah Rahul Sonia की makkari aur janta ko dhokha dene की karyavahi है. ap jaise chapluso की vajah se hi is tarah की manmani karane की himmat padati है.Yahi wajah है की congress me ek se badh ker ek kabil hote huye Rahul ke gudgan karane ko badhya है.Yah kahi se desh hit me nahi haiki sirf chaplusi me desh ke rashtriya hito ko najarandaj ker ke khali is liye Rahulko her marj की dawa bataya jai.

के द्वारा: omprakashshukla omprakashshukla

आपका ब्लॉग निष्पक्छ कहा से है, आप साफ-२ राहुल गाँधी की कार्यशैली को बेहतर मान रहे है, सोचिये जब आपके पास सरकार की ताकत हो और आप वियर्थ की पब्लिक प्रसंशा पाने को सादगी का ढोंग करते देश भर में फिरे. आर के के जी, खुद सोचिये देश सरकार की पार्टी से सादगी चाह रहा है या महगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य भ्रस्ताचार की समस्याओ का निवारण. 'दरअसल भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए ऐसे नेता की जरुरत है जिसने राजनिति के संघर्ष के दौरान खुद कोई भूल न की हो, मंत्री बनने के लिए कोई समझोता न किया हो और न ही मंत्री पद जाने का डर हो, न पार्टी का दवाब हो न सहयोगियों का. .......ऐसा एक नेता देश में है जिसमे उपरोक्त सारी खूबिया तो है ही, इच्छशक्ति भी है, युवा भी और शिक्षित भी, 'राहुल गाँधी जी' देश के सामने ऐसी चुनोती के होते हुए भी सरकार के बजाये संगठन का काम देख रहे है और जानबूझ कर अपनी सरकार के कामकाज को इग्नोर करके, प्रधानमंत्री बन सकने की ताकत होते हुए भी न बनने का बडप्पन दिखाते देश भर में घूम रहे है, जबकि उन्हें किसी मंत्रालय का कार्यभार संभालना चाहिए था. -"देश के भावी प्रधानमंत्री यदि एक मंत्रालय बेहतर चला कर दिखा सके और उसके असर स्वरूप अन्य को विवश कर सके व देश को लाभ दिला सके तो अपने आप ही देशवासी उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने को आतुर हो उठेंगे, क्या जरुरत है संगठन में महासचिव बन कर देश भर को पार्टी से जोड़ने के अभियान चलाने और दलितों व मुस्लिमो का खोखला हितैषी बनने की. देश को सिर्फ मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार प्रधानमंत्री की नहीं बल्कि प्रतेक मंत्री को कुछ कर दिखने का दवाब बनाये रखने वाले नेता की जरुरत है, प्रधानमन्त्री खुद मजबूत होता तो गठबंधन की मज़बूरी होते हुए भी शरद पवार जैसे मंत्रियो के विभाग तो बदले ही जा सकते थे,क्या कारन है की पवार दो बार से एक ही विभाग पकडे बैठे है, कही खाद्य का भंडारण और निर्यात करने वालो से कुछ लिंक तो नहीं, किरकेट देखले या खाद्य. अजीब देश है जिसकी खबरों में प्रधानमन्त्री कम अन्य नेता ज्यादा नजर आते है. क्या ये समझा जाये की प्रधानमन्त्री जी सिर्फ काम में मसरूफ रहते है!? कोई फिल्म स्टार है जो मिडिया और जनता की बात पर ध्यान न देकर सिर्फ काम करेंगे. "अरे! देश जवाब सरकार के मुखिया से मांगता है न की गठबंधन के मुखिया से" बेशक भाजपा बहुमत में भले ही नहीं आई लेकिन उनका आरोप 'कमजोर प्रधानमंत्री, का बिलकुल सही था' यदि में राहुल गाँधी होता तो सरकार के काम-काज से देशवासियों का दिल जीतता, देश से नहीं तो कम से कम अपने विभाग से भ्रस्ताचार खत्म करके शुरुआत का संदेश देता. सप्ताह के पांच दिन मंत्रालय को तो दिन संगठन को भी देता. दो माह में एक साथ तीन दिन अपने निर्वाचन क्षेत्र को देता. राजसभा सदस्य और राजपाल के लिये सिर्फ बुद्धजीवियो, विशेषज्ञ और कानूनविद वियाक्तियो के आने के विय्वस्था करता न की पार्टी और सरकार के प्रति वफादार निठल्लो को राजसभा सदस्य और राज्यपाल बनाकर गन्दी परम्परा बनाये रखता. मुझे किसी निर्णय को लेने में कोई डर नहीं होता, की क्या होगा मेरे भविष्य का? मुझे विरासत में इतनी सम्पत्ति मिली है की सात क्या चौदह पीड़ी को भी भविष्य के प्रति आशंकित होने की जरुरत नहीं है. राजनीती और लोकतंत्र में अलग पहचान ही मेरी और मेरे देश की फिलवक्त जरुरत है. जय हिंद-जय भारत, छोटा मुह और बड़ी बात की इस बेलगाम वाणी को यही विराम देता हु, धन्यवाद' (शिब्बू आर्य मथुरा)

के द्वारा: shibbuaryamathura shibbuaryamathura

तुफैल ए. सिद्दकी जी सादर नमस्कार! आपने सर्वप्रथम अपनी अनमोल प्रतिक्रिया दी, यह मुझे आजीवन स्मरण रहेगा। नि:सन्देह आपके शब्द मुझे भविष्य में और भी अधिक समर्पित भाव से गरीबों, दलितों, पिछड़ों और पीड़ितों की दयनीय देश को समाज व देश के समक्ष रखने के लिए प्रेरित करेंगे। यदि आप जैसे संवेदनशील एवं विद्वान लोग इसी तरह की भावन रखें तो नि’िचत तौरपर हालात तेजी से बदल सकते हैं। आपकी अमूल्य एवं प्रेरणास्पद प्रतिक्रिया के लिए पुन: धन्यवाद। आपकी प्रतिक्रिया का जवाब थोड़ी देर से दे रहा हूँ, इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। उम्मीद है कि भविष्य में भी आपकी अनमोल प्रतिक्रियाएं बराबर मिलती रहेंगी। एक बार फिर बहुत-बहुत तुफैल ए. सिद्दकी जी.

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